सोमवार, 7 नवंबर 2016

चाल,चलन,चरित्र

                    आज देश में चारित्रिक अराजकता है।नव युवक/युवती  राजनेता , सामजिक नेता  को आदर्श मान कर अपना चरित्र  निर्माण करते हैं। परन्तु आज देश में कोई भी व्यक्ति ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है जिसे नई पीढ़ी आदर्श मान सके। पहले स्कूलों में चरित्र निर्माण के उद्देश्य से नैतिक शिक्षा  दी जाती थी, जिसमे महान  व्यक्तियों की जीवनियाँ ,कुछ मूल्यपरक कहानियाँ होती थीं।उस से बच्चों में जीवन के  उपयोगी मूल्यों का ज्ञान होता था और वे उन मूल्यों  को अपने जीवन में पालन कारने की प्रयत्न करते थे। परन्तु  आज मूल्यपरक शिक्षा की हल्ला तो होती है परन्तु कार्य नहीं होता। आज कल किसी ने कुछ कहा उसको लेकर अलग अलग व्यक्ति .अलग अलग अर्थ निकल  रहे है। इसे देखकर बचपन में पढ़ी हुई एक कहानी याद आ गई।
                    प्राचीन काल में प्रकाण्ड ज्ञानी एक महर्षि थे।उनके ज्ञान की चर्चा देव ,मानव ,दैत्य, सभी में  होती  थी।सभी उनसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते थे।उनका नाम था महर्षि यज्ञवल्क। एक दिन  महर्षि यज्ञवल्क के पास  एक- एक कर तीन बालक शिक्षा ग्रहण करने  के लिए आये। पहला बालक एक देव कुमार था। देव कुमार महर्षि के पैर छू कर प्रणाम किया। .तत्पश्चात हाथ जोड़कर कहा ,"गुरुदेव ! मै आपसे शिक्षा प्राप्त करने  की अभिलाषा लेकर आया हूँ। आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर मुझ पर अनुकम्पा करें । ".
                   देव कुमार की आग्रह को देख कर महर्षि ने कहा "तथास्तु ". और अन्य शिष्यों ने देवकुमार को लेकर गुरुदेव द्वारा निर्दिष्ट स्थान पर उसको पहुचां दिया। उसके रहने और पड़ने की ब्यवस्था कर दी।
                   थोड़ी देर बाद आया एक मानव बालक।उसने भी महर्षि  के पैर छू कर प्रणाम किया और कहा, "गुरुदेव मैं आपसे शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा लेकर आया हूँ।आप मुझे शिष्य बनाकर मुझ पर कृपा करे  " महर्षि ने पूर्ववत सर  हिलाया और कहा ,"तथास्तु ". तब मानव पुत्र भी यथा स्थान जाकर अपना अध्ययन शुरू कर दिया ।
                   अंत में  आया एक दानव पुत्र। उसने महर्षि को प्रणाम करने बाद कहा ,"गुरुदेव मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूँ। आप मुझे शिष्य के रूप में ग्रहण करें। गुरु देव ने उसको भी "तथास्तु " कहा और तीनो शिष्य अध्ययन में रत हो गए।
                   देवता में बुद्धि तीक्ष्ण  होती है। कोई भी विषय को हो जल्दी समझ जाते है। यहाँ भी वही  हुआ। कुछ दिनों के बाद सबसे पहले देवकुमार अपनी पढाई बहुत जल्दी समाप्त कर महर्षि के पास आकर प्रणाम किया और कहा , "गुरुदेव मैंने आपके दिए हुए  वेद , पुराण आदि सब शास्त्रों का अध्ययन पूरा कर लिया है। आप मुझे उपदेश दीजिये।"
                   गुरुदेव मुस्कुराते हुए देवकुमार को देखा और कहा ," द ".और चुप होगये। देव कुमार को कुछ भी समझ में नहीं आया । वह सोच रहा था, गुरुदेव बहुत अच्छी अच्छी बातें बताएँगे, जिसे वह ध्यान लगाकर सुनेगा और जीवन में उसका पालन करेगा।लेकिन यह क्या गुरुदेव के मुहँ से केवल एक शब्द "द " और कुछ नहीं? लेकिन दुरुदेव के मुहँ से कोई निरर्थक शब्द नहीं निकल सकता ,यही सोचकर वह   "द "  का अर्थ समझने की कोशिश करने लगा। थोड़ी देर सोचने के बाद उसने कहा ,"गुरुदेव मैं आपके उपदेश  का अर्थ समझ गया।"
 गुरुदेव ने कहा ,"हूँ  .  ....., बताओ।"
  देवकुमार ने कहा ,  " 'द'  का अर्थ 'दमन'। "
गरुदेव ने "हाँ " में सिर हिलाया और देवकुमार प्रणाम कर प्रस्थान किया।
                    मनुष्य में देवतायों से कम परन्तु दैत्यों से अधिक बुद्धि होती है।इसलिए मानव पुत्र ने भी जल्दी ही अपनी पढाई समाप्त कर गुरुदेव के पास आया, प्रणाम किया और निवेदन किया ," गुरुदेव मैंने सभी वेद पुराण आदि शास्त्रों का अध्ययन कर लिया है, मुझे उपदेश दीजिये।"
गुरुदेव ने पूर्ववत मुस्कुराया और कहा ,"द " और चुप हो गए।  मानव को आश्चर्य हुआ।सोचने लगा - गुरुदेव का यह कैसा उपदेश? परन्तु यही सोचकर की दुरुदेव के मुहँ से जो निकला है उसका कुछ तो अर्थ होगा ,वह सोचने लगा। कुछ देर बाद उसने कहा , "गुरुदेव आपके उपदेश का अर्थ मेरे समझ में आ गया है।"
गुरुदेव ने कहा ,"बताओ ",
मानव ने कहा ," 'द' का अर्थ है 'दान' "
गरुदेव ने फिर हाँ में सिर हिलाया और मानव प्रणाम कर आशीर्वाद लिया  और चला गया।
                  अन्त में दानव आया।उसने भी प्रणाम करने के बाद कहा," गुरुदेव मुझे उपदेश दीजिये।"
गुरुदेव ने वही शब्द फिर से कहा , "द ".
दानव भौंचक्का रह गया।उसकी मोटी बुद्धि में कुछ नहीं आया।  यह सोचकर की गुरुदेव जो कुछ बोलते हैं उसका कुछ न कुछ अर्थ जरुर होता है। वह सोचता रहा ,अंत में उसने "द " का अर्थ समझ लिया। उसने ख़ुशी ख़ुशी कहा, "गुरुदेव मुझे आपके उपदेश का अर्थ समझ में आ गया।"
गुरुदेव ने कहा ,"बताओ "
" 'द ' का  अर्थ है  'दया' " दानव  ने कहा।
गुरुदेव ने  मुस्कुराया । दानव प्रणाम किया और चला गया।
                उन तीनो शिष्यों के जाने के बाद आश्रम में उपस्थित अन्य शिष्यों ने  उत्सुकता से प्रश्न किया , "गुरुदेव आपने तीनों को एक ही उपदेश दिया। परन्तु उन तीनों ने अलग अलग उतर दिया, दमन ,दान और दया, और अपने तीनो उत्तर को सही बताया यह कैसे हो सकता है?
गुरुदेव ने कहा, "वत्सों किसी भी शब्द का एक अर्थ नहीं होता ,अनेक अर्थ होते है। यह व्यक्ति के सोच, उसकी समझ ,उसका परिवेश और जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण ही निर्धारित करता है कि वह कौन सा  अर्थ समझेगा। देश , काल, परिवेश के अनुसार शब्द का अर्थ बदलता है।" गुरुदेव ने आगे कहा ," देवता स्वभाव से भोग विलासी होते हैं। इन्द्र सुख के लिए कुछ भी कर सकते है।यही इन्द्रियां उन्हें सुख देती है और दुःख भी। इसलिए देवकुमार ने सोचा कि गुरुदेव ने मुझे इन्द्रियां दमन करने के लिए कहा। इसलिए उसने 'द ' का अर्थ 'दमन' बताया।"
 मानव के बारे में गुरुदेव ने बताया ," मानव स्वभाव से संचयी होते हैं। उसे जितना चाहिए  उससे ज्यादा संग्रह करना चाहता है। जीवन भर इतना संग्रह कर लेता है कि मृत्यु तक उसका उपयोग भी नहीं कर पाता।  इसलिए मानव  ने सोचा कि जिसका हम उपयोग नहीं कर सकते उसका 'दान' करने के लिए गुरुदेव ने कहा है।यही सोचकर मानव ने 'द ' का अर्थ 'दान' कहा है।"
                 "दानव स्वभाव से क्रूर ,निर्दयी होते है।मारपीट में विश्वास  रखते हैं। "द " से उसने सोचा कि गुरुदेव ने उसे दुसरो पर "दया " करने के लिये कहा है। इसलिए उसने 'द ' का अर्थ 'दया ' बताया। "

इस प्रकार महर्षि यज्ञवल्क ने शिष्यों को समझाया कि  परिवेश, पारिवारिक संकृति बच्चों के चरित्र निर्माण, उसकी सोच को दिशा देने में  महत्वपूर्ण भूमिका निभाते  हैं।


(अगले अंक में देखिये: - हमारे देश में अलग अलग परिवेश से आये नेता गण के चाल ,चलन , चरित्र  "द " के संदर्भ में।)

कालीपद "प्रसाद "

                    




                
















शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

प्रायश्चित्त,

                                             प्रायश्चित


          हीरानंद की बेटी रमला की शादी थी | गाँव के सभी लोग शादी में आमंत्रित थे |उत्सुकता से सब लोग बारात का इंतज़ार कर रहे थे |थोड़ी देर में बारात आ पहुँची | दूल्हा घोड़ी पर बैठा था और बाराती बाजे के साथ साथ थिरक रहे थे |द्वार पर स्वागत के लिए लड़की वाले आरती की थाली लेकर खड़े थे |दूल्हा जब द्वार पर पहुँचा तो गाँव के लोग दूल्हा के साथ खड़े एक चेहरे को देख कर भौंचक्के रह गए |वह व्यक्ति था शिवानन्द |केवल यही गाँव नहीं,आसपास के गाँव के लोग भी जानते थे कि हीरानंद और शिवानन्द के परिवारों में कट्टर दुश्मनी का रिश्ता है | कभी ये दोनों जिगरी दोस्त हुआ करते थे |अपनी दोस्ती को सदा कायम रखने के लिए दोनों ने मिलकर रमला की शादी शिवानन्द के बडे बेटे सुरेश से कर दी थी | रमला उस समय पाँच साल की थी और सुरेश सात साल का | विवाह के बारे में उन्हें कुछ भी पता नहीं था | बड़े हो कर सुरेश जब पढने शहर गया तो उसने कालेज में ही अपनी एक सहपाठिनी से प्रेम विवाह कर लिया और वहीँ शहर में ही रह गया | उस समय से दोनों परिवारों में दुश्मनी हो गई थी |

           आज शिवानन्द को बाराती के साथ देख कर गाँव वालों ने उसे घेर लिया और पूछा, “”आप यहाँ क्यों आये हैं?” गांववालों का आक्रोश देखकर हीरानंद आगे आया और शिवानन्द को गले लगा लिया फिर गाँव वालों को सम्बोधित करते हुए कहा, “भाइयों शिवानन्द आज मेरे साथ यहाँ अपने कुकर्म का प्रायश्चित करने आये है | हमने बिना समझे  बाल विवाह जैसे कुरीति को प्रश्रय दिया था और दोनों बच्चो की शादी कर दी थी | वे हम दोनों की गलती थी | शिवानन्द भी कभी अपने आप को क्षमा नहीं कर पाया और मुझसे सलाह करके ही उसने इस शादी की जिम्मेदारी अपने कन्धे पर उठाई | यह हम दोनों के कुकर्म का प्रायश्चित हैं|”


कालीपद 'प्रसाद'

शनिवार, 14 मई 2016

कोल्हू के बैल





                            एक कस्बे में एक साहूकार रहता था।उनके तीन बेटे थे। साहूकार ने अपने जीवन में गरीबी के दिन देखा था । एक एक पाई के लिए खून  पसीना  एक करना पड़ता था।  उसने यह सोच लिया था कि वह अपने बच्चों को इस गरीबी से मुक्ति दिलायेगा ।  इसलिए अपनी छोटी सी  दूकान से जो भी अर्जित होता था उसमें से केवल आधा ही अपने घर के खर्च के लिए उपयोग करता था बाकि सब अपने बेटों की पढाई लिखाई  के लिए जमा करके रखता था। बच्चे बड़े होते गए। उनके रहन- सहन , पढ़ाई  -लिखाई के खर्चे भी बढ़ते गए। साहूकार ने अपने संचित कोष से सबकी मांग पूरी की।सबको अपने अपने मन पसंद शिक्षा प्राप्त करने में पूरा सहयोग दिया, इस उम्मीद के साथ कि " बच्चे बड़े होकर अपने अपने पैर पर   खड़े हो जायेंगे।किसी को किसी के  सामने हाथ फ़ैलाने की जरुरत नहीं होगी। सब अपने अपने परिवार में खुश रहेंगे।  तीनो भाइयों के बाल बच्चे होंगे , हमारा एक भरा पूरा परिवार होगा। उस परिवार का ज्येष्टतम सदस्य होंगे हम, मैं और  मेरी पत्नी । हमें खूब आदर ,सम्मान मिलेगा। "                      
              बड़ा बेटा मोहित एल .एल .बी . की पढ़ाई समाप्त कर एडवोकेट बन गया। जिला अदालत में  प्राक्टिस करने लगा .वहीँ एक घर किराये पर  लेकर रहने लगा। शनिवार को घर आ जाता था और सोमवार को चला जाता था । इसके बाद दूसरा बेटा रोहित बी इ  पूरा करते ही उसे नौकरी मिल  गई। वह भी बाहर दुसरे शहर चला गया। तीसरा बेटा  रोनित का एम् बी बी एस  पूरा होने पर शहर में क्लिनिक खोल लिया। तीनो शनिवार को माँ बाप से मिलने घर आते और  कोई रविवार या कोई सोमवार अपने अपने कार्यस्थल पर पहुँच जाते।
                       साहूकार ने अब अपने बेटों के विवाह  के लिए योग्य पात्रियों का खोज करने लगा। इसमें उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई। उन्होंने एक एक कर तीनो बेटों की शादी कर दी। सभी बहुएं अपने अपने पति के साथ चली गई तो घर में रह गए साहूकार  और धर्मपत्नी सविता। जब सब चले गए तो साहूकार उदास हो गए परन्तु यह सोचकर कि बच्चे काम के लिए बाहर तो जायेंगे ही ,घर मे  बैठे तो नहीं रह सकते ,इसमें दुःख की क्या बात है ? वे लोग शनिवार और दुसरे छुट्टियों में तो आयेंगे ही ,तब जी भरके सबसे बात करेंगे।
                        शाहुकार को भरपूरा परिवार अच्छा लगता था।उसने उम्मीद किया  था कि  बच्चे अब उनसे आराम करने के  किये लिए  कहेंगे। . चलकर उनके साथ रहने के लिए कहेंगे।  अब दिन भर दूकान में बैठकर बूढी हड्डी में दर्द होने लग जाता है। शामको ठीक से खड़ा भी नहीं हो  पाता है । परन्तु हाय रे नियति ! साहूकार की आराम की बात  तो दूर , महीनो बीत जाता  कोई बेटा झांक कर  भी  नहीं देखता, न फोन पर हालचाल  पुछता।सब अपने अपने दुनिया में मस्त हो गए। साहूकार की पत्नी जब कभी फोन करती तब एक ही जवाब मिलता ,"काम बहुत है इसलिए नहीं आ पा रहे  है।"सभी लोग काम में इतना व्यस्त हो गए कि  माँ बाप के हालचाल पूछने का भी  समय नहीं है, यह बात साहूकार को हजम नहीं हुआ।वह कुछ नहीं कहता ,मन मसोस कर रह् जाता।उसे अकेलापन महसूस होने लगा।वह अवसाद ग्रस्त होने लगा।
                         दूकान अक्सर बंद रहता था क्योकि साहूकार की मानसिक पीड़ा और बुखार ने उन्हें बहुत कमजोर   बना दिया था।जब शाहूकार शय्याशायी हो गए तब साहूकार की पत्नी सबिता  ने छोटे बेटे रोनित को फोन कर  बताया कि उसके पिता बीमार है। रोनित पिता को देखने आया  और कुछ  दवाइयाँ देकर माँ को  कहा , "इन दवाइयों को सुबह, दोपहर और शाम खाना खाने के बाद खिलाओ, आराम हो जाएगा।खून के परिक्षण के बाद पता चलेगा कि बुखार का कारण  क्या है। रोनित अपने क्लिनिक लौटकर अपने दोनों भाइयों को फोन से पिताजी के बिमारी के बारे में बताया। यह भी बताया कि अगले रविवार को वह फिर घर जा रहा है।
                      रविवार को सबसे पहले रोनित अपनी पत्नी  के साथ आया। पिताजी का ब्लोड़  रिपोर्ट भी साथ लाया था। उसने पिता जी को बताया की रक्त की कमी है। साथ में उसने दवाइयाँ भी लाया था। उसे कब कब खाना है यही बता रहा  था  अभी मोहित और रोहित भी आ पहुचे। दोनों ने रोनित से  पिताजी के बारे में पूछा। रोनित ने बताया कि  उनको खून की कमी के साथ स्नोफिलिया भी है।  इसकी वजह तकलीफें  ज्यादा है परन्तु अभी पहले से अच्छा है। साहूकार को अच्छा लगा कि उनकी बीमारी की बात सुनकर तीनों बेटे दौड़कर उन्हें देखने आये लेकिन यह ख़ुशी ज्यादा देर तक रह नहीं पाई। . 
                         रोनित  ने कहा ,"पिताजी को आराम करने दो, आप सब पास  वाले कमरे में जाकर बैठो।  सब लोग दुसरे कमरे में जाकर बैठ गए। सभी बहुएं भी उपस्थित थी। उन सबको मुखातिब होकर साहूकार की पत्नी   ने कहा ,"बेटे अब तुम्हारे पिताजी दूकान ठीक से चला नहीं पा रहे है। इस उम्र में  दिन भर  एक जगह बैठे रहना कष्ट दायक है। हाथ पैर फुल जाता है। कमर के दर्द से परेशान हैं। उनकी इच्छा है कि वह दूकान बंद कर दें और तुम लोगो के पास बारी बारी से रहे। तुम लोग क्या कहते हो।"
                        इसपर रोहित ने कहा ,"मैं तो शहर में एक कमरा वाला घर किराया में लेकर रहत हूँ। वहां तो जगह  नहीं है और दो या तीन कमरे वाला  घर का किराया इतना ज्यादा है कि  मैं ले नहीं सकता. इसलिए आपलोग भैया के पास या रोनित के पास रह सकते हैं। "
                  मोहित, जो एडवोकेट है, कहने लगा ," मेरा प्राक्टिस ठीक से चल नहीं रहा है। इसलिए हमेशा कडकी रहती है। रोनित का क्लिनिक अच्छा चल रहा है।"  रोनित दोनों भाइयों की ररफ देखा फिर बोला ,"भैया ,मेरा क्लिनिक तो अभी अभी शुरू हुआ है ,पास में बहुत पुराने क्लिनिक हैं। लोग ज्यादा उधर जाते हैं। अभी मुझे पैर जमाने में समय लगेगा।"  
                   साहूकार पास के कमरे में लेट कर बच्चों की सारी  बातें सुन ली।उनको बड़ा दू:ख हुआ  कि  जिन बच्चों के लिए सभी सुख सुविधायों को त्यागकर उनके भविष्य संवारने लगे थे ,वे आज उनकी जिम्मेदारी लेने  के लिए तैयार नहीं है , सब अपनी अपनी लाचारी बता रहे हैं। बच्चों की रवैया देखकर दिलको अचानक , अप्रत्याशित  गहरी चोट लगी। दिल  रो उठा, आँखों  के कोने से दो बूंद आंसू आहिस्ता आहिस्ता लुडक गए। साहूकार के आँख पर पुत्र मोह की जो पट्टी बंधी थी ,मन को कड़ा  करके उसने उसे हटा दिया। वह धीरे धीरे उठ बैठा और आवाज देकर सबको अपने कमरे में बुला लिया।
              जब सब लोग आ गए तब साहूकार ने कहना शुरू किया ," बेटे तुम सबको बहुत धन्यवाद !मेरी बीमारी की बात सुनकर तुम लोग अपने अपने काम धंधे छोड़कर मुझे देखने आये। तुम लोगो को हमारे बारे में चिंता करने की जरुरत नहीं है। तुम्हारी माँ ने जो कुछ कहा उसपर ध्यान मत देना। माँ ,बाप तो होते ही कोल्हू के बैल जैसे।कोल्हू के बैल को जब घानी  में जोता  जाता है तब उसके आँखों पर काली पट्टी बाँध दी जाती है ताकि  वह यह देख न पाए कि कितना तेल निकला है क्योंकि उसके दिल में भी तेल पीने की इच्छा होती है। इसलिए तेली उसके आंखों की पट्टी खोलने के पहले तेल अन्य पात्र में स्थानांतरित कर देता है।जब बैल की आँख की पट्टी खुलती है तो वह देखता है पात्र में तो तेल नहीं है या नहीं के बराबर है।इतना मेह्नात् करने  के बाद भी विन्दुमात्र तेल भी नहीं निकला ........... ?'"
                साहूकार एक लम्बी स्वांस छोड़कर फिर कहना शुरू किया ,"माँ बाप के आँखों पर भी पुत्र-पुत्री पेम की पट्टी बंधी  रहती है।प्यार ,मुहब्बत में वे यह सोचते रहते है की ये बच्चे ही तो हैं जो हमें वृद्धावस्था में प्यार देंगे ,सम्मान देंगे,बुढ़ापा का लाठी बनकर हमें सहरा  देंगे।  परन्तु आँखों  की पट्ठी जब खुलती है तो पता लगता है कि  जिसे वे प्यार समझ कर बच्चों में लुटा रहे थे  ,वह प्यार है ही नहीं। बच्चे तो उसे माँ बाप का फर्ज मानकर भूल जाते है। बच्चों के पास माँ बाप से बात करने का न तो समय है ,न दिल में प्यार या आदर की भावना।इस हालत में माँ बाप का कर्मफल का पात्र खाली के खाली रह जाता है .न उसमे किसी का प्यार होता है ,न आदर सम्मान ,होता है केवल अवहेलना और एकाकीपन। हुए न माँ बाप कोल्हू के बैल ?"  
                     खैर ,अच्छा  लगा  ,तुम लोग आये और ईश्वर ने  ही तुमलोगों के माध्यम से मेरी आँखों की पट्टी खोल दी। वास्तव में "आशा ' "उम्मीद" नामक  बिमारी ने मुझे जकड लिया था। है तो यह मानसिक बीमारी लेकिन मेरे मन के साथ साथ शरीर को  भी  बहुत कमजोर  और  पंगु  बना दिया था। मन से जब मैंने  इन बिमारियों को निकाल बाहर फेंका तो मुझे अच्छा लगने लगा है। काम करने का उत्साह पैदा हो रहा है। नये  सिरे से  जिंदगी जीने की इच्छा पैदा हो रही है।  तुम लोग हमारी चिंता मत करो। जाओ अपने अपने काम में लग जाओ। कभी कोई जरुरत होगी तो हम तुम्हे बता देंगे। अब मुझे थोडा आराम करने दो।" कहकर साहूकार लेट गया। 
                 बड़ा बेटा  मोहित कुछ कहना चाहता था परन्तु  डा .रोहित ने इशारे से मना  कर दिया और सबको बाहर जाने के लिए कहा। धीरे धीरे सब निकल कर पास वाले कमरे में जाकर बैठ गए। कमरे में शांति छाई हुई थी। किसी ने कुछ नहीं कहा। बच्चों को अपनी गलती का एहसास हो चूका था परन्तु क्या करे समझ नहीं पा रहे थे। माँ ने बच्चों से कहा ,"तुम लोग अभी जाओ ,बाद में मैं तुम्हारे पिताजी से बात करुँगी। बच्चों ने  माँ से वादा किया की वे अब हर सप्ताह बारी बारी आया करेंगे और पुरे दिन उन  लोगों के साथ रहेंगे।
                     साहूकार के गृहस्थी में फिर से एकबार खुशियाँ  दस्तक देने लगी थी। अब हर शनिवार कोई बेटा   घर आ जाते थे  और पूरा रविवार उनके साथ बिताते थे । साहूकार की एकाकीपन   दूर होने लगा। वह खुश रहने लगा। साहूकार दूकान में एक नौकर रख लिया था । लेन देन ,  हिसाब किताब सब वही  करता  था। साहूकार केवल पैसा लेने का काम करता था । सप्ताह में एक दिन वह वृद्धाश्रम जाकर सभी आश्रमवासी का  एक दिन का भोजन का  प्रबंध दूकान के आमदनी से करने लगा।आश्रम वासियों से घुलमिल कर बात करने में शाहुकार को बहुत आनंद आता था।  शाम को जब पति पत्नी  घर लौट आते तो उन्हें मन की  शांति मिलती  यह सोचकर कि यह काम "आशा -उम्मीद" से परे है इसलिए इसमें  न दू:ख है न  धोखा होने की कोई भय है।


"आशा -अपेक्षा -उम्मीद ", जब पूरा नहीं होता  तो दू:ख् होता है। इनसे जो मुक्त है वह सुखी है।          



रचना :कालीपद "प्रसाद"
सर्वाधिकार सुरक्षित
   
   

                      
   

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

मजदूर दिवस !


 मजदूर दिवस !

मई महीने के पहला दिन को मे डे के रूप में मनाया जाता है | इसे “अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस” या केवल “मजदूर दिवस” भी कहते हैं | १८६० से ही १० से १६ घन्टे की कार्यावधि एवं कार्य क्षेत्र की प्रतिकूल परिस्थिति के विरुद्ध ८ घन्टे प्रतिदिन कार्यावधि और कार्य क्षेत्र की बेहतर परिस्थिति की माँग उठती रही थी | परन्तु इसकी स्वीकृति यु एस में १८८६ में मिली | पहली मई १८८६ को यु एस के १३००० औद्योगिक संस्थानों से तीन लाख से भी अधिक लोग काम छोड़कर मई दिवस मनाने चले गए | सिकागो में ४०००० लोग हड़ताल पर बैठ गए | तब से मई दिवस मनाये जाने लगा | अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पहली मई (First May ) को मनाया जाता है परन्तु यु एस में सितम्बर में मनाया जाता है |
       वास्तव में यह मजदूर ही है जिसके खून पसीने के बल पर दुनिया प्रगति के पथ पर आगे बढ़ रही है | चाहे यु एस का व्हाइट हॉउस हो, या बकिंघम पैलेस हो , या फिर ताजमहल या राष्ट्रपति भवन हो ,इन सबके हर ईंट, हर पत्थर मजदूरों के पसीने से भीगा हुआ है | अगर ये इमारतें प्रगति के मापदण्ड हैं, तो इस प्रगति का प्रमुख श्रेय इन मजदूरों को जाना चाहिए | समाज को उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए| किन्तु अकृतज्ञ शाहजहाँ ने तो उन मजदूरों के हाथ कटवा दिये थे ताकि वे दूसरा ताजमहल न बना सके | यह स्वार्थ और अकृतज्ञता का पराकाष्ठा है | आज भी मजदूरों से ८ घन्टे से ज्यादा काम कराया जाता है परन्तु उन्हें पूरी मजदूरी नहीं दी जाती है | शहरी क्षेत्र में हालत थोडा सुधरी है परन्तु ग्रामीण क्षेत्र में मजदूरी पूरी नहीं मिलती | बिहार और झाडखंड जैसे राज्यों से ऐसी खबरें आये दिन समाचार पत्रों में पढने को मिलती है |
       देश की उन्नति में मजदूरों का योगदान अतुलनीय है | खेत खलिहानों में मजदूर, सड़क निर्माण में मजदूर, गृह निर्माण में मजदूर, औद्योगिक संस्थानों के उत्पादों में मजदूर, मजदूर का कार्यक्षेत्र असीमित है| उनकी महता भी असीमित है | सबसे बड़ी बात यह है कि देश निर्माण के हर क्षेत्र में पहला ईंट और आखरी ईंट वही रखता है, परन्तु कभी घमंड से यह नहीं कहता है कि मैं देश सेवा करता हूँ या मैं राष्ट्र भक्त हूँ | उसका समर्पित भाव ही बता देता है कि वह राष्ट्रभक्त है और राष्ट्रवादी भी | उसके विपरीत नेता और अधिकारी काम के लिए मोटी तनख्वा तो लेते ही हैं, साथ में बड़े बड़े घपले करते हैं, |अरबों रुपये लूटकर अपने तिजोरी भर लेते हैं और देशसेवा और देश भक्ति का दावा करते हैं |
      आजकल “राष्ट्रवादी” शब्द का प्रयोग बहुत ज्यादा हो रहा है | एक दो चुने हुए नारा लगा दिया और खुद को स्वयं ही राष्ट्रवादी घोषित कर दिया | जिसने वह विशेष नारा नहीं लगाया, उसे राष्ट्र विरोधी घोषित कर दिया | अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए जुलुश निकाला और राष्ट्र की संपत्ति (बस, भवन इत्यादि ) को नुक्सान पहुंचाया| उनसे ज़रा कोई पूछे कि मजदूर जो कभी कोई नारा नहीं लगाता है, परन्तु राष्ट्र की संपत्ति निर्माण में अपना खून पसीना एक कर रहे हैं, वे सब मजदूर राष्ट्रवादी  हैं या नारा लगाकर राष्ट्रीय संपत्ति को हानि पहुँचाने वाले राष्ट्रवादी हैं ? नारा लागाने से कोई राष्ट्रभक्त नहीं बन जाता है और ना लगाने वाले देशद्रोही नहीं बन जाता है | जो सच्चे मन से देश के निर्माण कार्य में योगदान देते हैं, वही सच्चा देशभक्त है ,वही राष्ट्रवादी है | हमारे मजदूर ही सही मायने में राष्ट्रभक्त है, सच्चा राष्ट्रवादी है |
          जय मजदूर ! जय भारत !!


कालीपद ‘प्रसाद’

सोमवार, 27 जुलाई 2015

इंसान ईश्वर को क्यों पुजता है ?





भूल जाते है इन्सान कि मृत्यु अटल है
हर कोई यहाँ मृत्यु की पंक्ति में खड़ा है
क्रमागत मृत्योंमुखी है किन्तु इतना धीरे
आभास नहीं होता ,यही तो आश्चर्य है | 

हाँ ,इंसान को पता नहीं लगता कि कब वह मृत्यु के द्वार पहुँच गया |जिंदगी मौज मस्ती में बिता देता है ,दूसरों को मरते देखकर भी नहीं सोचता कि उसे भी एक दिन इस दुनिया को छोड़कर जाना है  |
महाभारत में यक्ष ने युधिष्ठिर से पूछा था,”दुनियाँ में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ?”
युधिष्ठिर का जवाब भी यही था ,”लोग दुसरे को मरते हुए देखते है परन्तु यह नहीं सोचते कि उसे भी एक दिन मरना होगा और बेफिक्र होकर अपने जीवन में मस्त रहते हैं| यही सबसे बड़ा आश्चर्य है |“
यक्ष तो संतुष्ट हो गया था इस जवाब से ,किन्तु इंसान के मन में झांककर अगर देखें तो शायद यह उत्तर सही नहीं था | इंसान कभी भी मृत्यु के प्रति बेफिक्र नहीं रहा है | वह बेफिक्र होने का दिखावा करता है |भय को छुपाने की कोशिश करता है | उसे हर घडी मृत्यु का भय सताता है |  मृत्यु की भय से उसे कभी भी मुक्ति नहीं मिली | कभी यह दबा रहता है कभी उभर कर ऊपर आ जाता है तब उसके मन,प्राण ,शरीर में कम्पन उत्पन्न करता है | वह उस भय से बचने के लिए किसी की तलास करता है जो उसे मृत्यु के भय से बचा सके | वह किसकी तलास करता है ? कौन उसको मृत्यु के हाथ से बचा सकता है ? उसे नहीं पता | उस अनजान व्यक्ति को इंसान ने ईश्वर ,अल्लाह, गॉड के नाम से पुकारा | अगर मृत्यु नहीं होती तो इंसान ईश्वर ,अल्लाह, गॉड को याद नहीं करते,न उसको पूजते और न मंदिर,मस्जिद ,चर्च,गुरुद्वारा बनाते | यह मृत्यु का डर ही है जिसके कारण ईश्वर का अस्तित्व है | ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए मंदिर,मस्जिद,चर्च,गुरुद्वारा बनाये गये | वो इनसान जिसे मौत से डर नही लगता ,वह न मंदिर जायगा न भगवान को पुजेगा | जब तक मृत्यु का भय है तब तक ईश्वर की पूजा होती रहेगी और मंदिर मस्जिदे बनते रहेंगे | अत: यह भय ही है जो इंसान जो भगवान के शरण में जाने के लिए मजबूर कर देते हैं |
         मौत तो प्रत्यक्ष है ,परन्तु मौत से बचाने वाले भगवान अप्रत्यक्ष है , यह एक रहस्य है |इस रहस्य से जिस दिन पर्दा हट जायगा उस दिन मंदिर,मस्जिद जैसे देवस्थान का महत्व भी घट जायगा |  ईश्वर जब सामने होंगे तो मंदिर की जरुरत क्या रहेगी ? पण्डे ,पुजारी ,ज्योतिषों,मठाधीशों के धंधे बंद हो जायेंगे |
         मनुष्य में सोच है ,यही भय उत्पन्न करता है |पशु पक्षी में मनुष्य जैसा सोच नहीं है | इसीलिए वे हमेशा भयभीत नहीं रहते हैं | आपातकालीन खतरे का भय है ,प्राण बचाने के लिए छटपटाते है किन्तु यह क्षणिक है | मनुष्य सदा भयभीत रहते हैं | प्रश्न उठता है ,- आखिर यह भय क्यों है ? गीता में कहा गया है ,” जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग कर नया वस्त्र धारण करता है वैसे ही आत्मा पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करती है |”
इंसान इस बात को सुन लेता है, पढ़ लेता है, परतु उस पर पूरा आश्वस्त नहीं हो पाता है|  पुराना वस्त्र  त्याग कर नया वस्त्र धारण करने में उसे डर नहीं लगता क्योंकि नया वस्त्र के बारे में वह सब कुछ जानता है ,वह निश्चिन्त रहता है | किन्तु पुराना शरीर छोड़ने के बाद उसे नया शरीर मिलेगा या नहीं, इसके बारे में उसे कोई निश्चित जानकारी नहीं है | इस शरीर को छोड़ने के बाद वह कहाँ रहेगा ? कौनसा शरीर मिलेगा ? मिलेगा या नही मिलेगा ?  कुछ भी पता नहीं | ये सब अज्ञानता के अन्धकार में छुपा है और इस अन्धकार में उसे धकेल देती है मौत | इस अनिश्चितता  के कारण मृत्यु से इंसान को डर लगता है | यदि उसे मृत्यु के
पहले और बाद में होनेवाली हर घटना की जानकारी मिल जाय तो शायद वह ईश्वर को याद करना भी भूल जाय | हो सकता है उस समय भगवान् की अवधारणा बदल जाय |  हर हाल में मृत्यु का भय ही मनुष्य को भगवान के शरण में ले आता है |

कालीपद ‘प्रसाद’                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

बुधवार, 22 जुलाई 2015

मानव अस्तित्व खतरे में !





मानवविज्ञानी एवं वैज्ञानिकों का मत है - पृथ्वी की उत्पत्ति के लाखों वर्ष बाद पृथ्वी में जीव की उत्पत्ति हुई |महुष्य की उत्पत्ति बहुत बाद करीब चालीश लाख साल बाद हुई वो भी होमो (Homo) के रूप में | परन्तु आधुनिक मनुष्य जिसे Homo Sapiens कहते हैं, उसकी उत्पत्ति करीब २००.००० वर्ष पहले हुई थी, परन्तु मनुष्य के शारीरिक,मानसिक और व्यवहारिक क्रमिक विकास ४०-५०,००० वर्ष पूर्व शुरू हुई | इतने लम्बे समय के बाद मनुष्य अपने आपको जीव में सर्वश्रेष्ट मानते है |यह सच भी है, लेकिन आज का मनुष्य का इतिहास इतना पुराना नहीं है | भारत को ही ले लिया जाय तो वैदिक काल से पहले का कोई प्रमाणित/विश्वसनीय इतिहास उपलब्ध नहीं है | इससे यही कहा जा सकता है कि भारत में आधुनिक मनुष्य का आगमन करीब ५००० साल पूर्व हुआ था |
रामायण, महाभारत में ज्ञान, विज्ञानं, आग्नेय अस्त्र, वरुण अस्त्र, वायु अस्त्र, विमान आदि का उल्लेख है |प्रश्न उठता है क्या वास्तव में वे अस्त्र और विमान मौजूद थे या यह केवल रचनाकार की काल्पना है? क्या वाणों से आग निकलती थी? पानी गिरता था? हवा चलती थी? या अतिशयोक्ति है? इसके प्रबल समर्थकों का उत्तर होगा हाँ ये सब थे पर नष्ट हो गए| अगर उनकी बात मान ली जाय तो फिर प्रश्न उठता है कि कैसे नष्ट हो गए? इससे सम्बंधित ज्ञान की पुस्तकें कहाँ गई? इसके उत्तर में  समर्थक चौराहे पर खड़े नज़र आते हैं| कौन सा जवाब दें समझ में नहीं आता है| एक तरफ श्रीकृष्ण को भगवान मानते है और मानते हैं कि धर्म की रक्षा के लिए भगवान कृष्ण ने महाभारत का युद्ध करवाया| दुसरे तरफ पूर्ण विकसित सभ्यता का विनाश का जिम्मेदार कृष्ण को मानते हैं| श्रीकृष्ण चाहते तो इस युध्द को रोक सकते थे किन्तु रोका नहीं| इसी युद्ध में मानव के साथ मानव इतिहास के सभी उपलब्धियाँ नष्ट हो गई| महाभारत के बाद नई सभ्यता की जन्म हुई| आज का मानव उसी सभ्यता का उपज है|
       कहते हैं,”इतिहास अपने आपको दोहराता है|“ आज विश्व की जो दशा है, परिस्थितियाँ जैसे बदल रही है, उससे लगता है मनुष्य की अस्तित्व ही खतरे में है| अहम्, प्रतिस्पर्धा, आणविक अस्त्रों का जाल जैसा फैलता जा रहा है, उसे देखकर यही लगता है कि संसार के सारे वुद्धिजीवी एवं वैज्ञानिक केवल आधुनिक सभ्यता नहीं, ईश्वर की सर्वोत्तम सृष्टि मानव जाति को भी पृथ्वी से निर्मूल करने में तुले हुए हैं| आज अगर मनुष्य की अस्तित्व मीट गयी तो फिर लाखों वर्ष लग जायेंगे पृथ्वी पर मानव सभ्यता विकास होने में| वैज्ञानिक अपना ज्ञान रचनात्मक कार्य में लगायें, ना कि परमाणु या जैविक अस्त्रों के निर्माण में| शक्तिशाली राष्ट्र विनम्रता दिखाएँ और अपनी शक्ति विश्व मानव कल्याणकारी काम में लगाएं| इस सभ्यता को एवं मानव जाति को सुरक्षित रखने के लिए प्रतिवद्धता दिखाए अन्यथा पृथ्वी एक दिन अपनी सृजन पर आँसू बहायगी|

कालीपद 'प्रसाद'

सोमवार, 22 जून 2015

अपूर्ण योग दिवस !

            २१ जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया |यह एक अच्छी शुरुयात है |इसके लिए आयोजक एवं इसमे भाग लेनेवाले सभी प्रतिभागी बधाई के पात्र हैं | 'योग' का अर्थ होता है 'जोड़ना" 'या "मिलाना"  अर्थात एक से अधिक वस्तुओं को एक दुसरे से संयुक्त करना ,उसमें एकरूपता लाना | ऋषि,मुनि , योगियों के लिए योग का अर्थ है- तन,मन को शांत कर आत्मा के साथ संरेखन कर परमात्मा तक पहुँचने के लिए प्रयत्न करना | अस्वस्थ शरीर में मन स्वस्थ नहीं हो सकता और अगर मन अस्वस्थ है तो ईश्वर के ध्यान में मन नहीं लगेगा | इसीलिए सबसे पहले शरीर को स्वस्थ व निरोगी बनाना अत्यन्त आवश्यक है | शरीर स्वस्थ होगा तो मन स्वस्थ होगा, तब परमात्मा के ध्यान में एकाग्रता आयगी | अत: योग का उद्येश्य है - तन,मन और आत्मा में अनुरूपता स्थापित करना |
             महर्षि पतंजलि के अनुसार योग का अर्थ "योगस्यचित्त वृत्तिनिरोध:" अर्थात योग मन के वृत्ति को रोकता है ,मन के भटकन पर नियंत्रण करता है |उन्होंने योग को आठ भागों में बांटा है जिसको अष्टांग योग कहते हैं | वे इस प्रकार हैं :- १.यम  २. नियम ३. आसन  ४. प्राणायाम  ५. प्रत्याहार  ६. धारणा ७.समाधि और ८. ध्यान |
            योग दिवस पर आयोजकों ने योग के केवल आसन और प्राणायाम पर ध्यान केन्द्रित किया है | इसके पहले यम और नियम आते हैं परन्तु इन पर ध्यान देना उचित नहीं समझा क्योंकि यम के अन्तर्गत "सत्य व अहिंसा का पालन , चोरी न करना ,आवश्यकता से अधिक चीजों का इकठ्ठा न करना " शामिल है | आज जग जाहिर है कि नेता न सत्य के मार्ग पर चलते हैं न अहिंसा का पालन करते हैं | इसके विपरीत वे दो समुदायों में हिंसा फैलाकर अपने वोटबैंक को पक्का करते हैं | मंत्री बड़े बड़े घपला कर सरकारी धन का गबन करते हैं ,दुसरे शब्दों में कहे तो चोरी करते हैं | बेनामी धंधों में माल इकठ्ठा करते हैं | ये सब योग के यम सिद्धांत के विपरीत हैं |इस दशा में यम का पालन कैसे कर सकते हैं ? अत; नेताओं ने यम पर न बोलना ही अपने हित में समझा और यम,नियम को छोड़कर सीधा आसन और प्राणायाम को योग के रूप में प्रस्तुत किया | योग के मूल सिद्धांत को छोड़कर केवल शारीरिक व्यायाम  को ही  योग का नाम दे दिया | यदि सही मायने में योग को अपनाना चाहते है तो योग के सभी आठ अंगों का पूरा पूरा पालन करना चाहिए | भ्रष्टाचार में डूबे देश के लिए यह उचित होगा कि मंत्री ,नेता ,सकारी व अ-सरकारी कर्मचारी पहले यम का पालन करने का शपथ लें और  तदनुरूप व्यावहार करे तभी योग दिवस मनाना सफल माना जायगा अन्यथा यह एक और दिखावा बनकर रह जायगा |

कालीपद "प्रसाद"

मंगलवार, 9 जून 2015

ईश्वर का स्व-रूप क्या है ?

                                     जितने लोग उतने ही सोच ,उतने ही रूप l इसीलिए कहा गया है ,"मुंडे मुंडे  मतिर्भिन्न "l  यह बात शत  प्रतिशत हिन्दू धर्म के लिए लागू होता है l हिन्दू धर्म में तैंतीस कोटि देव देवियाँ हैं l इन तैंतीस कोटि देव देवियों की उत्पत्ति की कहानी शायद इसी सिद्धांत को प्रतिपादित करती है l उस समय धरती पर शायद तैंतीस कोटि लोग रहते थे और हर एक व्यक्ति ने भगवान का एक रूप की कल्पना किया होगा और उसकी  पूजा किया होगा l किसी ने भगवान् को पुरुष रूप में पूजा किया तो किसी ने स्त्री (देवी ) के रूप में l किसी की मान्यता में कोई बंदिश नहीं थी l इस प्रकार तैंतीस कोटि देव देवियों की उत्पत्ति हो गयी l चूँकि हिन्दू धर्म दुसरे धर्म की भांति प्रवर्तित धर्म नहीं है l किसी धर्म गुरु,महात्मा ,पैगम्बर या अवतारी पुरुष द्वारा शुरू नहीं किया गया है , यह सनातन काल से जीवन जीने की पद्धति हैl ईश्वर और ईश्वर  की आराधना के लिए सर्वमान्य कोई एक मत नहीं है जो  दुसरे धर्म में है l  इसीलिए इसे  धर्म न कहकर हिन्दुस्तानी जीवन पद्ध्यति  कहना  ठीक होगा l कोई बंदिश न होने के कारण लोग मन मानी  ढंग से ईश्वर की कल्पना की l किसी ने निराकार माना तो किसी ने साकार रूप में पूजा की l साकार रूप में भी एक रूपता नहीं है ,मानव  से लेकर बानर ,पशु,पक्षी ,साँप ,मछली और पेड़ पौधों के रूप में भी ईश्वर की पूजा की l इसके आगे इन सभी देव देवियों की अस्तित्व और महत्व को प्रतिपादित करने के लिए अनेको मन गड़ंत कहानियाँ लिखकर प्रचारित किया गया है किसी ने यह नहीं सोचा की साधारण मनुष्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा l साधारण व्यक्ति इन विविधताओं में फंस कर द्विविधा में पड  गए हैं, यह निश्चय नहीं कर पा रहे हैं कि किस रूप में भगवान् की पूजा करें l तैंतीस कोटि देव देवियों में किसकी पूजा करें और किसको छोड़े ? जिसकी पूजा नहीं करेंगे वो नाराज हो जायेंगे और हामारे परिवार पर दुःख का पहाड़ टूट  पड़ेगा l ऐसा किस्से कहानियों द्वारा  बाताया  गया है l धर्मभीरु जनता में यह अंध विश्वास का जाल फैला हुआ है l उन्हें कौन समझाय कि ईश्वर की कल्पना कल्याण कारी है ,विनाशकारी नहीं है l हलाकि पूजा से खुश होकर भगवान् ने प्रत्यक्ष रूप में न किसी का भला किया है न नाराज होकर किसी की नुकसान किया है l भावुकता में लोग किसी भी घटना को अपने विश्वास के अनुसार भगवान् की कृपा और दंड से जोड़ लेते हैं l 
                           इसी प्रकार साफ सफाई को लेकर भी लोगों में  अलग अलग धारना है l कुछ लोग कहते हैं  कि भगवान की पुजा साफ़ सुथरा होकर करना चाहिये  l इसीलिए वे नहा -धोकर नए वस्त्र पहनकर मंदिर मस्जिद जाते है l
                            परन्तु दुसरे लोगों का कहना है तन में तो हमेश गन्दगी भरी रहती है ,उसको पूर्ण रूप से साफ करना असंभव है l बाहरी सफाई तो हो जाती है परन्तु अन्दर की सफाई रह जाती है l
 इसीलिए तन जैसा भी हो, मन शुद्ध  होना चाहिए l मन में शुद्ध भक्ति भाव  होना चाहिए lमन में हिंसा ,द्वेष,ईर्ष्या ,घृणा ,,भेद-भाव नहीं होना चाहिए l सबके प्रति सम भाव होना चाहिए तभी ईश्वर खुश होते है l  
                           तीसरे प्रकार के लोग जिनमे ज्यादातर साधू संत होते हैं l वे "आत्मशुद्धि " की बात करते है अर्थात आत्मा की सफाई l अब उन साधू संतों को कौन समझाए  कि साधारण जन को तो अभी तक पता ही नहीं है कि आत्मा है क्या चीज और रहती है कहाँ l फिर उसकी सफाई कैसे करे ?
                           इन सब बातों से यही प्रतीत होती है कि ईश्वर दर्शन के मामले में इंसान उन छै अंधों जैसे हैं जो हाथी देखने चले थे और सब ने  हाथी का अलग अलग रूप  बताया l जिसने  पूंछ पकड़ा उसने हाथी को रस्सी जैसा समझा ,जिसने पैर पकड़ा ,उसने खम्भा जैसे समझा ,जिसने  कान पकड़ा ,उसने हाथी को सुपा जैसा समझा l इसी प्रकार बांकी तीनो ने भी हाथी को अलाग अलग रूप में वर्णन किया किन्तु  सबका वर्णन मिलाकर भी पूर्ण हाथी का स्वरुप सामने नहीं आया l अलग अलग धर्म के धर्मगुरू या स्वघोषित गुरु इन अन्धो की भांति अपनी अपनी कल्पना की घोड़ी को दौड़ा रहे हैं परन्तु ईश्वर के पूर्ण रूप का कल्पना नहीं कर पा रहे है l वास्तव में ईश्वर  का स्वरुप मनुष्य के कल्पनातीत  l एक चिंटी हाथी के शरीर पर चढ़कर भ्रमण तो कर सकता है परन्तु पूर्ण हाथी को अपनी आँखों से देख नहीं सकता वैसे ही इंसान इतना छोटा है और ईश्वर इतना महान हैं कि ईश्वर का समग्र रूप की कल्पना करना भी इंसान के लिए असंभव है | |


     कालीपद "प्रसाद "


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